देहरादून। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाले प्रख्यात निशानेबाज जसपाल राणा के आकस्मिक निधन से देशभर में शोक की लहर है। खेल जगत के इस चमकते सितारे को आज अंतिम विदाई दी जाएगी। उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए देहरादून स्थित उनके आवास पर रखा जाएगा, जहां खेल प्रेमी, शुभचिंतक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए वाराणसी ले जाया जाएगा। जसपाल राणा के निधन की खबर सामने आते ही उनके पैतृक गांव टटोर, नैनबाग, चिलामू और आसपास के पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। गांव के लोगों के लिए यह विश्वास करना मुश्किल था कि जिस बेटे ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश और प्रदेश का नाम रोशन किया, वह अब उनके बीच नहीं रहा। खबर मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण और उनके प्रशंसक देहरादून के लिए रवाना हो गए ताकि अपने प्रिय खिलाड़ी को अंतिम श्रद्धांजलि दे सकें। जसपाल राणा के करीबी मित्र प्रदीप कवि, मोहन सिंह रावत और डॉ. विरेंद्र सिंह रावत ने उन्हें याद करते हुए बताया कि वे बेहद सरल, मिलनसार और जमीन से जुड़े व्यक्ति थे। उन्होंने कहा कि चार-पांच माह पूर्व जब जसपाल राणा कुछ दिनों के लिए गांव आए थे, तब भी उन्होंने आम लोगों से आत्मीयता के साथ मुलाकात की थी। उनके व्यक्तित्व में कभी भी उपलब्धियों का अहंकार नहीं दिखा। यही कारण था कि वह अपने गांव और क्षेत्र के लोगों के बीच हमेशा लोकप्रिय रहे।
जसपाल राणा का जन्म उत्तरकाशी जिले में हुआ था। उस समय उनके पिता नारायण सिंह राणा भारत.तिब्बत सीमा पुलिस में तैनात थे। बचपन से ही अनुशासित वातावरण में पले.बढ़े जसपाल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मसूरी और दिल्ली सहित विभिन्न शहरों में प्राप्त की। दिल्ली में अध्ययन के दौरान ही उनकी रुचि निशानेबाजी की ओर बढ़ी और उन्होंने इस खेल में व्यवस्थित प्रशिक्षण लेना शुरू किया। अपनी प्रतिभा, मेहनत और समर्पण के दम पर उन्होंने जल्द ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली। जसपाल राणा ने अपने करियर में अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई पदक जीते और देश का गौरव बढ़ाया। उनकी उपलब्धियों ने भारतीय निशानेबाजी को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह केवल एक सफल खिलाड़ी ही नहीं थे, बल्कि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत भी थे। खेलों के प्रति उनका समर्पण केवल अपने करियर तक सीमित नहीं था। वर्ष 2012 से उन्होंने युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। देहरादून स्थित अपनी शूटिंग रेंज में वह आर्थिक रूप से कमजोर और प्रतिभाशाली बच्चों को निशुल्क प्रशिक्षण देते थे। उनके करीबी बताते हैं कि उनका सपना था कि ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करें। इसी उद्देश्य से उन्होंने अनेक युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर दिया।
परिवार की बात करें तो पूर्व खेल राज्य मंत्री नारायण सिंह राणा के तीन बच्चों में जसपाल सबसे बड़े थे। उनके छोटे भाई सुभाष राणा भी अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज रहे हैं और वर्तमान में शूटिंग कोच के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनकी बहन सुषमा राणा भी राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज रही हैं। आज वह केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के परिवार की बहू हैं। जसपाल राणा की खेल विरासत अब उनके बच्चों के माध्यम से भी आगे बढ़ रही है। उनकी बेटी देवांशी राणा ने शूटिंग की विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं में स्वर्ण और कांस्य पदक जीतकर परिवार और देश का नाम रोशन किया है। वहीं उनका पुत्र युवराज भी निशानेबाजी के क्षेत्र में अपना भविष्य संवार रहा है। खेलों के प्रति समर्पण और उत्कृष्टता की यह परंपरा राणा परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। जसपाल राणा का जीवन संघर्षए अनुशासन, समर्पण और उपलब्धियों की मिसाल रहा। उन्होंने अपने खेल कौशल से देश को गौरवान्वित किया और अपने व्यक्तित्व से लाखों लोगों का दिल जीता। उनका निधन भले ही एक युग का अंत हो, लेकिन उनकी उपलब्धियां, उनके आदर्श और उनके द्वारा तैयार की गई नई पीढ़ी हमेशा उन्हें जीवित रखेगी।
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